Sunday, April 11, 2010

हमेशा गाँव ही खुद को शहर में ढाल लेते हैं

गरीबी में भी बच्चे यूँ उड़ाने पाल लेते हैं

ज़रा सी डाल झुक जाए तो झूला डाल लेते हैं

 
जहाँ में लोग जो ईमान की फसलों पे जिंदा हैं
 
बड़ी मुश्किल से दो वक्तों की रोटी दाल लेते हैं

 
शहर ने आज तक भी गाँव से जीना नहीं सीखा
 
हमेशा गाँव ही खुद को शहर में ढाल लेते हैं

 
परिंदों को मोहब्बत के कफस में कैद कर लीजे
 
न जाने लोग उनके वास्ते क्यों जाल लेते हैं

 
अभी नज़रों में वो बरसों पुराना ख्वाब रक्खा है
 
कोई भी कीमती सी चीज़ हो संभाल लेते हैं

 
ये मुमकिन है खुदा को याद करना भूल जाते हों
 
तुम्हारा नाम लेकिन हर घडी हर हाल लेते हैं

 
हमें दे दो हमारी ज़िन्दगी के वो पुराने दिन
 
'रवि' हम तो अभी तक भी पुराना माल लेते हैं

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