Monday, June 14, 2010
राहत इन्दौरी साहब की कलम से....
बीमार को मरज़ की दवा देनी चाहिए
मैं पीना चाहता हूँ पिला देनी चाहिए
अल्लाह बरकतों से नवाज़ेगा इश्क़ में
है जितनी पूँजी पास लगा देनी चाहिए
ये दिल किसी फ़कीर के हुज़रे से कम नहीं
ये दुनिया यही पे लाके छुपा देनी चाहिए
मैं फूल हूँ तो फूल को गुलदान हो नसीब
मैं आग हूँ तो आग बुझा देनी चाहिए
मैं ख़्वाब हूँ तो ख़्वाब से चौंकाईये मुझे
मैं नीद हूँ तो नींद उड़ा देनी चाहिए
मैं जब्र हूँ तो जब्र की ताईद बंद, हो
मैं सब्र हूँ तो मुझ को दुआ देनी चाहिए
मैं ताज हूँ तो ताज को सर पे सजायें लोग
मैं ख़ाक हूँ तो ख़ाक उड़ा देनी चाहिए
Friday, June 11, 2010
सपने टूटे
छूटे हमसे अपने छूटे !
मासूमों के सपने टूटे !!
भद्दी गाली, झापड़, घुड़की !
बचपन की क़िस्मत में झिड़की !
सब दरवाजे बंद; चिढ़ाए
हमको हर घर की हर ख़िड़की !
नज़र हमें आते हैं जब तब
हाथ-हाथ में पांच अंगूठे !!
किस-किस से की हाथापाई !
बीन के कचरा, रोटी खाई !
सिक्के चार हाथ में आए;
हाय! छीन ले पुलिस कसाई !
ऊपर से थाने ले जा कर
नंगा कर के बेंत से कूटे !!
बाबूजी कुछ काम दिला दें !
गाड़ी धो दूं, चाय पिला दें !
भले-भले लोगों की हरकत ?
हैवानों के हृदय हिला दें !
इज़्ज़त वाले अवसर पा'
बेबस बचपन की अस्मत लूटे !!
खूटे जग से सच्चे खूटे !
बाकी रह गए लम्पट झूठे !
हमसे ईश्वर-अल्ला रूठे !
भाग हमारे बिल्कुल फूटे !
गड़ते जाएंगे छाती में
इक-इक दिन में सौ-सौ खूँटे !!
Thursday, June 10, 2010
अपनी रातें काटा कर
तन्हाई को टा टा कर
कुछ तो सैर सपाटा कर
फटे पुराने चाँद को सी
अपनी रातें काटा कर
आवाज़ों में से चेहरे
अच्छे सुर के छाँटा कर
बेचैनी को चैन बना
दिल के ज्वार को भाटा कर
दिल की बातें सुननी हैं?
दिल में ही सन्नाटा कर
आवारा बन जा, नज़रें
खिड़की-खिड़की बाँटा कर
माना कर सारी बातें या
सारी बातें काटा कर
आँच चिढ़ाती है "आतिश "
तू लौ बन कर डाँटा कर
Subscribe to:
Posts (Atom)