ख्वाहिशें, टूटे गिलासों सी निशानी हो गई।
जिदंगी जैसे कि, बेवा की जवानी हो गई।।
कुछ नया देता तुझे ए मौत, मैं पर क्या करूं
जिंदगी की शक्ल भी, बरसों पुरानी हो गई।।
मैं अभी कर्ज-ए-खिलौनों से उबर पाया नहीं
लोग कहते हैं, तेरी गुड़िया सयानी हो गई।।
आओ हम मिलकर, इसे खाली करें और फिर भरें
सोच जेहनो में नए मटके का पानी हो गई।।
दुश्मनी हर दिल में जैसे कि किसी बच्चे की जिद
दोस्ती दादा के चश्मे की कमानी हो गई।।
मई के ‘सूरज’ की तरह, हर रास्तों की फितरतें
मंजिलें बचपन की परियों की कहानी हो गई।।
Saturday, November 27, 2010
Saturday, November 20, 2010
उसे इश्क क्या है पता नहीं
उसे इश्क क्या है पता नहीं
कभी शम्अ पर जो जला नहीं.
कभी शम्अ पर जो जला नहीं.
वो जो हार कर भी है जीतता
उसे कहते हैं वो जुआ नहीं.
है अधूरी-सी मेरी जिंदगी
मेरा कुछ तो पूरा हुआ नहीं.
न बुझा सकेंगी ये आंधियां
ये चराग़े दिल है दिया नहीं.
मेरे हाथ आई बुराइयां
मेरी नेकियों को गिला नहीं.
मै जो अक्स दिल में उतार लूं
मुझे आइना वो मिला नहीं.
जो मिटा दे ‘देवी’ उदासियां
कभी साज़े-दिल यूं बजा नहीं.
Friday, November 19, 2010
कबीर के दोहे
सन्त मिले सुख ऊपजै दुष्ट मिले दुख होय ।
सेवा कीजै साधु की, जन्म कृतारथ होय ॥
आब गया आदर गया, नैनन गया सनेह ।
यह तीनों तब ही गये, जबहिं कहा कुछ देह ॥
एक घड़ी आधी घड़ी, आधी में पुनि आध ।
कबीर संगत साधु की, करै कोटि अपराध ॥
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