Showing posts with label Romantic. Show all posts
Showing posts with label Romantic. Show all posts

Monday, January 3, 2011

छोड़ दे....

उससे कह दो मुझे सताना छोड़ दे....
दुसरो के साथ रह कर..
मुझे हर पल जलना छोड़ दे....

या तो कर दे इनकार
की
मुझसे महोब्बत नहीं.....
या गुजरता देख मुझको...
पलटकर मुस्कुराना छोड़ दे.....

न कर बात मुझसे कोई गम नहीं...
न कर बात मुझसे कोई गम नहीं...
यु आवाज सुनकर...
झरोखे पर आना छोड़ दे...

कर दे दिल-ए-बयां....
जो छुपा रखा है....
यु इशारो में...
हाल बताना छोड़ दे....


क्या इरादा है बता दे अब मुझको
यु सहेलियों को मेरे किस्से...
सुनना छोड़ दे.....

है पसंद गुलाबी रंग मुझे...
है पसंद गुलाबी रंग मुझे...
उस लिबास में..
बार बार...
आना छोड़ दे.....


ना कर याद मुझे बेशक तू... कोई गम नहीं....
पर किताबो पर नाम लिख कर...
मिटाना छोड़ दे....

खुदा कर सके ये किस्सा आसान अगर...
या तो तू मेरी हो जा....
या मुझे... अपना बनाना छोड़ दे.......

Thursday, December 30, 2010

ना जाने अब वो कैसी होगी ..

काफी  अरसा  बीत  गया ,
ना  जाने  वो  कैसी   होगी .
वक़्त  की  सारी  कडवी  बातें
चुप  चुप  के  वो  सहती  होगी .
अब  भी  भीगी  बारिश  में  वो
बिन  छतरी  के  चलती  होगी .
मुझसे  बिछड़े  अरसा  हो  गया .
अब  वो  किससे  लडती  होगी .
अच्छा  था  जो  साथ  में  थे ..
बाद  में  उसने  सोचा  होगा .
अपने  दिल  की  सारी  बातें ,
खुद ही  खुद  से  करती  होगी ..
आंखे  नाम  भी  होती  होगी .
याद   वो  जब  भी  करती  होगी .
काफी  अरसा  बीत  गया..
 ना  जाने  अब  वो  कैसी होगी ..



Dr. Chirayu Mishra

Thursday, December 23, 2010

अच्छा लगता है

तनहाई का चेहरा अक्सर सच्चा लगता है|
खुद से मिलना बातें करना अच्छा लगता है। |१|

दुनिया ने उस को ही माँ कह कर इज़्ज़त बख़्शी|
जिसको अपना बच्चा हरदम बच्चा लगता है। |२|

वक्त बदन से चिपके हालातों के काँधों पर|
सुख दुख संग लटकता जीवन झोला लगता है|३|

हम भी तो इस दुनिया के  वाशिंदे हैं यारो|
हमको भी कोई बेगाना  अपना लगता है। |४|

सात समंदर पार रहे तू,  कैसे समझाऊँ|
तुझको फ़ोन करूँ तो कितना पैसा लगता है। |५|

मुँह में चाँदी चम्मच ले जन्मे, वो क्या जानें?
पैदा होने में भी  कितना  खर्चा लगता है। |६|

शहरों में सीमेंट नहीं तो  गाँव करे भी क्या|
उस की कुटिया में तो  बाँस खपच्चा लगता है। |७|

वर्ल्ड बॅंक ने पूछा है हमसे,  आख़िर - क्यों कर?
मर्सिडीज में भी  सड़कों पर झटका लगता है। |८|

दुनिया ने जब मान लिया फिर हम क्यूँ ना मानें!
तेंदुलकर हर किरकेटर का चच्चा लगता है। |९|

-नवीन चतुर्वेदी

अनवरत


मै मांगती  हूँ 
तुम्हारी सफलता 
सूरज के उगने से बुझने तक 
करती हूँ 
तुम्हारा इंतजार 
परछाइयों के डूबने तक 
दिल के समंदर में 
उठती लहरों को 
 रहती हूँ थामे 
तुम्हारी आहट तक 
खाने में 
परोस के प्यार 
निहारती हूँ मुख 
 महकते शब्दों के आने तक 
समेटती हूँ  घर 
बिखेरती  हूँ  सपने 
दुलारती  हूँ  फूलों  को 
तुम्हारे  सोने  तक 
रात  को  खीच  कर   
खुद  में  भरती  हूँ  
नींद  के शामियाने में 
 सोती हूँ जग-जग के 
तुम्हारे उठने तक 
इस तरह 
पूरी होती है यात्रा 
प्रार्थना  से  चिन्तन  तक।    









Monday, June 14, 2010

तुम्हारे प्यार की खुशबू


तुम्हारे प्यार की खुशबू, जेहन में तैरती मेरे;
 
सुबह हो शाम हो दिन हो, सदा रहती मुझे घेरे॥

 

तुम्हारी याद में खोया रहा मैं, क्यों यहाँ अक्सर
 
मिले जो खत मुझे तुमसे, निकलता हूँ उन्हें पढ़कर
 
तुम्हारी राह तकता हूँ, मुझे भी तक रही है वह
 
बनाऊँ किस तरह उन पर, तुम्हारे ख्वाब के डेरे
 
तुम्हारे प्यार की खुशबू, जेहन में तैरती मेरे...॥

 


बहुत बेचैन होता हूँ, अगर तुमको ना देखूँ तो
 
ये फूलों का मुकद्दर है, तुम्हारे पास फेंकूँ तो
 
उमंगों की कली, खिलकर मचलती है यहां अक्सर
 
तुम्हारे बिन सबेरे भी सताते हैं नजर फेरे
 
तुम्हारे प्यार की खुशबू, जेहन में तैरती मेरे ..॥

 


तुम्हें अब हो गई फुरसत, ह्रदय में छा रहे हो तुम
 
हिमालय से बही गंगा, बहाये जा रहे हो तुम
 
चलो अब सीपियाँ ढूढ़ें, चलो मोती कहीं चुन लें
 
तुम्हारे साथ चलकर हम, उतर जायें कहीं गहरे
 
तुम्हारे प्यार की खुशबू, जेहन में तैरती मेरे...॥

Tuesday, June 1, 2010

डॉ. राहत इन्दौरी





तूफानों  से  आंख  मिलाऊँ , सैलाबों  पे  वार  करूं...

मल्लाहों  का  चक्कर  छोडू तैर  के   दरिया  पार  करू...

 
फूलों  की  दुकाने  खोलो खुशबू का  ब्यापार  करू...
 
इश्क  खता  है  तो  ये  खता,  एक  बार  नहीं  सौ  बार  करूं.


-राहत इन्दौरी

Monday, May 31, 2010

क्या लिखूँ


कुछ जीत लिखू या हार लिखूँ
 

या दिल का सारा प्यार लिखूँ ॰॰॰॰॰॰
 

कुछ अपनो के ज़ाज़बात लिखू या सापनो की सौगात लिखूँ ॰॰॰॰॰॰
 

मै खिलता सुरज आज लिखू या चेहरा चाँद गुलाब लिखूँ ॰॰॰॰॰॰
 

वो डूबते सुरज को देखूँ या उगते फूल की सान्स लिखूँ
 

वो पल मे बीते साल लिखू या सादियो लम्बी रात लिखूँ
 

मै तुमको अपने पास लिखू या दूरी का ऐहसास लिखूँ
 

मै अन्धे के दिन मै झाँकू या आँन्खो की मै रात लिखूँ
 

मीरा की पायल को सुन लुँ या गौतम की मुस्कान लिखूँ
 

बचपन मे बच्चौ से खेलूँ या जीवन की ढलती शाम लिखूँ
 

सागर सा गहरा हो जाॐ या अम्बर का विस्तार लिखूँ
 

वो पहली -पहली प्यास लिखूँ या निश्छल पहला प्यार लिखूँ
 

सावन कि बारिश मेँ भीगूँ या आन्खो की मै बरसात लिखूँ
 

गीता का अॅजुन हो जाॐ या लकां रावन राम लिखूँ॰॰॰॰॰
 

मै हिन्दू मुस्लिम हो जाॐ या बेबस ईन्सान लिखूँ॰॰॰॰॰
 

मै ऎक ही मजहब को जी लुँ ॰॰॰या मजहब की आन्खे चार लिखूँ॰॰॰

Friday, May 28, 2010

मैं तुम्हारी प्रतीक्षा में दहलीज पर,


 ---------------------------------------------



मैं तुम्हारी प्रतीक्षा में दहलीज पर,

सांतिये नेह के बस बनाता रहा

नैना तकते रहे सूनी पगडंडियाँ,

दीप देहरी पे मन बस जलाता रहा !!

तुम मिले तो लगा मन के हर कोन में,

फिर बसंती पवन का बसेरा हुआ

तुम मिले तो लगा की ग्रहण छट गया,

मन में फिर आस का इक सवेरा हुआ !

इस सवेरे के उगते हुए सूर्य पर,

अर्घ्य निज प्रेम का मैं चढाता रहा !!

दीप देहरी पे मन बस जलाता रहा !!

तुम मिले तो लगा प्रश्न हल हो गए,

वे जो मेरी तुम्हारी प्रतीक्षा में थे

तुम मिले तो लगा जैसे हट से गए,

सब वो संशय जो भावुक समीक्षा में थे !

फिर बनी प्राण , सुख, शान्ति, आधार तुम

मैं तुम्हे अंक भर मोक्ष पाता रहा !!

देहरी पे मन बस जलाता रहा !!

मौन उपमाएं हैं तुम को क्या मैं कहूं,

तुम ही पत्नी, सखा, प्रेमिका, हो प्रिये

हो मेरे गीत तुम, गीत में शब्द तुम,

तुम ही लय, भाव, तुम भूमिका हो प्रिये

मुक्त निज कंठ से, मन से हर मंच से,

तुम को गाता, तुम्ही को बुलाता रहा !!

दीप देहरी पे मन बस जलाता रहा !!

Friday, April 30, 2010

सुना वो भी नहीं करते.. कहा हम भी नहीं करते...

मिला वो भी नहीं करते..
मिला हम भी नहीं करते..
वफ़ा वो भी नहीं करते..
दगा हम भी नहीं करते..!


उन्हें रुसवाई का दुःख....
उन्हें रुसवाई का दुःख..
हमे तन्हाई का डर...
गिला वो भी नहीं करते..
शिकवा हम भी नहीं करते...!

किसी मोड़ पर मुलाक़ात हो जाती है अक्सर....
किसी मोड़ पर मुलाक़ात हो जाती है अक्सर....
रुका वो भी नहीं करते...
रुका हम भी नहीं करते...


जब भी देखते है उन्हें,
सोचते है कुछ कहें...
जब भी देखते है उन्हें,
सोचते है कुछ कहें...
सुना वो भी नहीं करते..
कहा हम भी नहीं करते...


लेकिन ये भी सच है..
की उन्हें भी है मोहोब्बत हमसे..
इंकार वो भी नहीं करते...
इज़हार हम भी नहीं करते....


A Msg Sent By Mr. Dr. Chirayu Mishra From Indore