Tuesday, May 25, 2010

हर रस्ते की एक कहानी लगती है


 -


ये जोड़ी इक राजा रानी लगती है
 
सीधी सादी एक कहानी लगती है

 
दिल भी कितनी बार सुने, झेले इसको
 
धड़कन की हर बात पुरानी लगती है

 
जंगल, वादी, सहरा दरिया ..सब सहरा
 
मुझको तेरी गोदी धानी लगती है

 
बात बुजुर्गों की सुनता है कौन भला
 
बच्चों की बातें, नादानी लगती है

 
आवाजों के जमघट में सन्नाटा है
 
कुछ तो इसने मन में ठानी लगती है

 
मुझे खबर है, खुदा है, वो ना आयेगा
 
उसकी "हाँ" भी "आनाकानी" लगती है

 
आज समन्दर ने उसको कुछ यूँ देखा
 
नदिया शर्म से पानी-पानी लगती है

 
दिल के सेहन में शब भर महकी जाती है
 
बात तुम्हारी रात की रानी लगती है

 
चौराहों पर मिल कर कहते सुनते हैं
 
हर रस्ते की एक कहानी लगती है

 
थोड़ी आँच ज़रा रौशनी और धुआँ
 
"आतिश" की हर इक शय फानी लगती है

Thursday, May 20, 2010

इश्क सचमुच इक बला है

इश्क सचमुच इक बला है

खुद मजा है,खुद सजा है



हो गई फ़िर से खता है

दिल तुझे जो दे दिया है



इश्क सचमुच इक बला है

रोग भी खुद,खुद दवा है



गम से बचकर है निकलना

प्यार ही बस रास्ता है



आ रही शायद वही है

दिल मेरा जो झूमता है



है हसीं अपनी धरा ये

चाँद पीछे घूमता है



ढूंढता है ‘श्याम किसको

दिल हुआ क्या लापता है

माना तुम्हें शहर ने जगमग जगमग रातें दी होंगी

भरा-भरा सा दिन लगता है लेकिन खाली-खाली शाम

कहाँ गयी चौपालों वाली बतियाती मतवाली शाम



घर जाने का मन होता था मन में घर आ जाता था

शाम ढले ही इंतजार में खुलती खिड़की वाली शाम




सारे दिन की थकन मिटाती गय्या जैसी लगती थी

आँगन के पीपल के नीचे करती हुई जुगाली शाम



बाबूजी का हुक्का पानी अम्मा का चूल्हा चौका

सब बच्चों की अपने अपने हिस्से वाली थाली शाम



सूरज जाते जाते लेकर चला गया है अपने साथ

मैंने सिर्फ तुम्हारी ख़ातिर इतनी देर संभाली शाम





वो चौपालों की शामें थीं ये शामे चौराहों की

आवारा सड़कों संग बैठी होगी कहीं मवाली शाम





माना तुम्हें शहर ने जगमग-जगमग रातें दी होंगी

पर इसके बदले में इसने देखो 'रवि' चुराली शाम 




--रवीन्द्र शर्मा 'रवि